Hindi – Atula Gupta https://atulagupta.in Science | Nature | Conservation Wed, 28 May 2025 07:19:53 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.1 चिंता: सुंदरबन पर मंडराता जलवायु परिवर्तन का काला साया https://atulagupta.in/2025/03/10/%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be/ https://atulagupta.in/2025/03/10/%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be/#respond Mon, 10 Mar 2025 06:42:51 +0000 https://atulagupta.in/?p=257

गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के संगम पर स्थित सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा ज्वारीय खारे पानी का मैंग्रोव वन है। भारत और बांग्लादेश के लगभग 10,000 वर्ग कि.मी. में फैला यह वन, किसी परिकथा की काल्पनिक दुनिया से कम नहीं।

घने मैंग्रोव वन, ज्वारीय जलमार्ग, नम-भूमि और द्वीप, जिनमें धरती, आकाश और पानी में रहने वाले अद्भुत जीव-जंतु निवास करते हैं। पर मानव द्वारा बनायीं गयी ऐसी कई चीज़े हैं जो आज सुंदरबन को नुक्सान पंहुचा रही हैं- प्रदूषण, नदियों पर बांधों का निर्माण, भूमि खनन और इन सब में सबसे बड़ा नाम – जलवायु परिवर्तन।

अद्वितीय सुन्दरी

सुंदरबन का नाम यहां पाए जाने वाले सुन्दरी पेड़ों के कारण हैं। इन पेड़ों की खास बात है उनकी हाथ-पांव सी दिखने वाली जड़ें जो पानी से बाहर सांस ले सकती हैं और जलमग्न स्थिति में भी ऑक्सीजन ग्रहण करने में मदद करती हैं। इनकी पत्तियां मोटी और मोमयुक्त होती हैं, जो पानी की कमी और उच्च लवणता के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करती हैं। पर जलवायु परिवर्तन इनकी क्षमताओं को चुनौती दे रहा है।

पिछले कुछ दशकों में बढ़ते समुद्र स्तर और मीठे पानी के प्रवाह में कमी के कारण सुंदरबन में मिट्टी और पानी की लवणता बढ़ रही है। सुंदरी पेड़ अधिक लवणता सहन नहीं कर पाते, जिससे उनका विकास रुक रहा है और कई स्थानों पर ये पेड़ मर रहे हैं।

बांग्लादेश स्पेस रिसर्च एंड रिमोट सेंसिंग ऑर्गनाइजेशन द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि चांदपाई रेंज जैसे क्षेत्रों में सुन्दरी पेड़ों का क्षेत्र 1988 में 16,000 हेक्टेयर से घटकर 2022 में 12,500 हेक्टेयर हो गया है। इन पेड़ों की जगह अब अधिक लवणता-सहनशील प्रजातियां, जैसे ‘कांकरा’ ले रही हैं। यानि ना केवल सुंदरबन के मूल पेड़ कम हो रहे हैं बल्कि इस पूरे वन का स्वरुप ही बदलता जा रहा है।

यह इसलिए एक बड़ी खतरे कि घंटी है क्योंकि सुंदरी पेड़ों के इर्दगिर्द यहां के जीव-जंतु और यहां रह रहे लोगों का पूरा संसार बसता है। मछली, मेंढक, कछुए इन पेड़ों के बीच अपने नवजात शिशुओं को जन्म देते है। सुंदरी पेड़ समुद्र से सटे गाँवों को समुद्र की ऊँची लहरें और समुद्री आंधियों, चक्रवातों से बचाते हैं।

अब जलवायु परिवर्तन के कारण सुंदरबन में चक्रवातों की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ रही है। अम्फान, 2020; यास, 2021; बिपरजॉय, 2023; ये चक्रवात सुंदरबन क्षेत्र में भारी नुकसान का कारण बने, जिससे जीवन और पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

climate change challenges on sundarban how climate change affect forest

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव – फोटो : तपन मुखर्जी

जीव-जंतुओं को खतरा

सुंदरबन दुनिया के कुछ अलबेले प्राणियों का भी घर हैं जैसे की मछुआरी बिल्ली, खारे पानी वाले मगरमच्छ, ओलिव रिडले टर्टल और गंगा नदी डॉलफिन। गंगा नदी डॉल्फिन या जिन्हें ‘सुसु’ भी कहा जाता है, भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव हैं।

1879 से प्राप्त अभिलेखों के अनुसार, मीठे पानी में रहने वाले ये स्तनधारी जीव बंगाल की खाड़ी से लेकर हिमालय की तराई तक तैरते थे। एक समय था जब ये सुंदरबन में आमरूप से देखे जा सकते थे परन्तु अब क्योंकि मौसम के परिवर्तन के चलते पानी की लवणता बढ़ रही हैं, इनके आवास सिमटते जा रहे हैं।

पर क्या खारे पानी के मगरमच्छ अपनी संख्या बढ़ा पा रहे हैं? दुर्भाग्यवश, नहीं। इन मगरमच्छों को भी जीवित रहने के लिए और प्रजनन के लिए मीठे पानी के क्षेत्र की आवश्यकता होती है। उच्च तापमान अंडों के इनक्यूबेशन पर प्रभाव डालता है, जिससे बच्चे मगरमच्छों के लिंग अनुपात में असंतुलन हो सकता है।

यदि अंडों का तापमान 30°C से कम होता है, तो अधिकतर मादा, और 33°C या अधिक तापमान पर अधिकतर नर मगरमच्छ बनते हैं। पृथ्वी के बढ़ते तापमान का अर्थ हैं केवल नर मगरमच्छ।

सुंदरबन एक ऐसी प्राकृतिक धरोहर हैं जिसे हम अपनी तकनिकी काबिलियत के बावजूद कभी कृत्रिम रूप से नहीं बना पाएंगे। पर इस बढ़ते संकट से अब भी जुझा जा सकता है। मैन्ग्रोव वनों का पुनरोपण और संरक्षण, कटाव और लवणता को नियंत्रित करने के लिए टिकाऊ जल और भूमि प्रबंधन, स्थानीय लोगों की भागीदारी आज उस वन को बचा सकते है जिसने सदियों से इस क्षेत्र को बचा कर रखा है।


Original Publication: Amar Ujala

Date: 10 March, 2025

Link: सुंदरबन

]]>
https://atulagupta.in/2025/03/10/%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be/feed/ 0
सर्दियों में भारत आकर परिवार बढ़ाते हैं दुर्लभ फिश ईगल https://atulagupta.in/2024/12/05/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf/ https://atulagupta.in/2024/12/05/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf/#respond Thu, 05 Dec 2024 06:56:38 +0000 https://atulagupta.in/?p=262

एक समय था जब वैज्ञानिक यह मानते थे कि पलास फिश ईगल हिमालय के उत्तर में, विशेषकर मंगोलिया में प्रजनन करते हैं। यह अनुमान इतना गलत भी नहीं था क्योंकि अधिकांश प्रवासी पक्षी ठंड के मौसम में गर्म इलाकों की ओर बेहतर भोजन और संसाधनों की तलाश में उड़ते हैं न की प्रजनन के लिए। ऐसे पक्षियों में अमूर फाल्कन, साइबेरियाई सारस शामिल हैं।

पलास फिश ईगल अक्तूबर से मार्च के बीच भारत, बांग्लादेश और भूटान में समय बिताते हैं और फिर मंगोलिया लौट जाते हैं, इसलिए यह मान लेना स्वाभाविक था कि अन्य प्रवासी प्रजातियों की तरह ये भी सर्दियों के महीनो में अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों में भोजन के लिए आ रहे हैं। पर वैज्ञानिकों को तब अचरज हुआ जब 2005 के बाद किये गए दो अलग-अलग सर्वेक्षण से यह पता चला कि सदियों से प्रवास कर रहे ये खास मेहमान असल में भारत ही की पैदावार है।

जन्मभूमि भारत 

1900 से पहले, पलास फिश ईगल एशिया के एक बड़े हिस्से में आम थे, जो पश्चिम में कैस्पियन सागर से लेकर पूर्व में चीन तक और उत्तर में रूस से लेकर दक्षिण में भारत और म्यांमार तक फैला हुआ था। अब यह प्रजाति म्यांमार, रूस और कैस्पियन सागर क्षेत्र में विलुप्त हो चुकी है। 

अन्य फिश ईगल पक्षियों की तरह यह भी जीवन पर्यन्त एक जोड़ा बनाते हैं और हर साल एक ही घोंसले को सवांरते-सुधारते 1-3 अंडे देते हैं। ये विशालकाय घोंसले अक्सर नदियों, धाराओं और नम-भूमियों के किनारो के पेड़ों पर बनाए जाते हैं जहां से आसानी से उनके मुख्य भोजन- मछली का शिकार किया जा सके।

जब वैज्ञानिकों ने मंगोलिया में 2005-2009 के बीच और फिर मंगोलिया और भारत में 2012-2015 के बीच दो अलग सर्वेक्षण किए तो उन्हें मंगोलिया में प्रजनन का कोई प्रमाण नहीं मिला। बल्कि दुर्गा, लचित, और चंगेज नाम के तीन पलास ईगल की पीठ पर जीपीएस ट्रैकर लगाकर वैज्ञानिकों ने पाया कि यह प्रजाति केवल उत्तरी भारत (मुख्य रूप से असम और उत्तराखंड में), और बांग्लादेश में प्रजनन करते हैं।

कजाकिस्तान, रूस और मंगोलिया में यह गैर-प्रजनन मौसम (मई से सितंबर) में रहते हैं। यानी हर साल ये जोड़े भारत आकर अपने वर्षों से उपयोग में लाए जा रहे घोंसले में नए जीवन को जन्म देते हैं।

एक और अनोखी बात जो सामने आई वो ये कि ट्रैक किए गए पक्षियों ने 6,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर हिमालय के ऊपर से सीधे उड़ान भरी। पहले इस ऊंचाई का रिकॉर्ड केवल बार हेडेड गीज पक्षी के नाम ही दर्ज था जो आज भी 7000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर उड़कर अपने प्रवास के लिए आते-जाते हैं। 

शक्तिशाली शिकारी 

पलास फिश ईगल ऊपर से गहरे भूरे रंग के होते हैं, जबकि पेट हल्के रंग का और सिर मैला-सा धूसर होता है। उड़ान के दौरान नीचे से देखने पर इनकी गहरी पूंछ पर चौड़ी सफेद पट्टी सबसे आकर्षक विशेषता होती है जिसके कारण इन्हें एक और नाम भी दिया गया हैं – बैंड-टेल्ड फिश ईगल।

पानी की सतह से मछलियां पकड़ने के अलावा, ये जल पक्षियों जैसे बत्तख, हंस, कूट और डेमोइसल क्रेन का शिकार भी करते हैं, साथ ही बगुलों के घोंसले और प्रजनन स्थलों से युवा आईबिस, ओपनबिल, डार्टर और टर्न पक्षियों का भी शिकार करते हैं। इन भारी भरकम शिकारियों को वयस्क हंस और अपने वजन से दोगुनी बड़ी मछलियां उठाकर उड़ते हुए भी देखा गया है। ऑसप्रे जैसे पक्षियों से ये खाना झपटकर लेने में भी माहिर हैं। 

दुर्भाग्यवश अपनी अद्भुत शिकार क्षमता और अकल्पनीय मीलों की सालाना उड़ान की क्षमता के बावजूद आज दुनिया में केवल 1000-2499 पलास फिश ईगल ही शेष बचे हैं और इसी वजह से इन्हें लुप्तप्राय जीव-जंतुओं कि श्रेणी में रखा गया है। 

जो पक्षी हिमालय कि चोटी लांघकर भारत अपने वंश को आगे बढ़ाने आते हैं आज उनकी संख्या इसलिए कम होती जा रही है क्योंकि हम ऊंची इमारतों के जंगल बसाने में उनसे उनके झील, नम-भूमि, किनारों में लगे पेड़ और घोंसले छीन रहे हैं। आशा हैं आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए ये विलुप्तता कि कगार में खड़े पक्षी अपने जन्मभूमि में सुरक्षित रह पाएंगे।


Original Publication: Amar Ujala

Date: 5 December, 2024

Link: पलास फिश ईगल

]]>
https://atulagupta.in/2024/12/05/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf/feed/ 0
बरसात में ज़मीन खोदकर निकलते हैं सह्याद्रि के अनोखे बैंगनी मेंढक https://atulagupta.in/2024/09/24/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95/ https://atulagupta.in/2024/09/24/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95/#respond Tue, 24 Sep 2024 07:19:35 +0000 https://atulagupta.in/?p=270

चूहे जैसी नुकीली नाक, बैंगनी रंग और बहुत से बैंगनों को अगर आपस में मेंढक के आकार में जोड़ दिया जाए, उस तरह का बुलबुले-सा फूला हुआ आकार – ऐसा एक अलबेला जीव भारत के सह्याद्रि के जंगलों में पाया जाता है. इन्हें नाम दिया गया है पर्पल फ्रॉग या भारतीय बैंगनी मेंढक और यह दुनिया के कुछ सबसे अदभुत माने जाने वाले जीवों में से एक है.

भारतीय बैंगनी मेंढक (Nasikabatrachus sahyadrensis) एक दुर्लभ प्रजाति है, जो अपना अधिकांश जीवन ज़मीन के नीचे बिताते हैं. केवल बरसात के मौसम में यह पृथ्वी के तल से बाहर निकलकर ऊपर ज़मीन पर आते है. इसमें भी मादाएं साल में केवल एक दिन के लिए, और वह भी सिर्फ़ कुछ घंटों के लिए, सतह पर आती हैं, ताकि वे मिलन कर सकें और अपने अंडे दे सकें.

दक्षिणी सह्याद्रि में मानसून की पहली बारिश के तुरंत बाद नर मेंढक भूमिगत रहते हुए ही आवाजें निकालना शुरू कर देते हैं, जैसे पहली बारिश उनके लिए कोई अलार्म घड़ी हो. फिर धीरे-धीरे कुछ नर सतह पर दिखाई देने लगते हैं, मादा के इंतज़ार में. यह इंतज़ार इस बात का भी रहता है कि मौसमी नदियों और धाराओं में अपेक्षाकृत पानी भर जाए.

प्रजनन के स्थान तक की यह यात्रा इन मेंढकों के लिए खतरों से घिरी और फ़िल्मी क्लाइमेक्स से कम नहीं होती. रास्ते में उल्लुओं और चेकर्ड कीलबैक सांपों जैसे शिकारी उन्हें खाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा खतरा सड़कें हैं, जो उनके आवासों को विभाजित करती हैं. कई स्थानों पर ये सड़कें इन मेंढकों के लिए मौत का जाल बन जाती हैं. इसके अलावा, अन्य दबाव जैसे बांध, अनियंत्रित पर्यटन, कचरा आदि तो हैं ही.

हालांकि वैज्ञानिको ने इस प्रजाति की खोज 2003 में की थी, सह्याद्रि के जंगलों में रहने वाली इडुकी इन्हें कई पीढ़ियों से जानते और समझते हैं. माना जाता है कि इन जीवों का प्राचीन वंश लगभग 12 करोड़ वर्षों से स्वतंत्र रूप से विकसित हो रहा है, और इन्होंने नए महाद्वीपों के निर्माण, महान डायनासोर के विनाश, हिमयुग और मनुष्यों के प्रमुख प्रजाति बनने जैसी घटनाओं को जीवित रहते हुए देखा है. वैज्ञानिकों के लिए यह गोंडवानालैंड नामक महाद्वीप के अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण जैविक प्रमाण हैं.

मौसम के पैटर्न में हल्का-सा बदलाव आने पर सबसे पहले प्रभावित होने वाले जीवों के समूहों में उभयचर (एम्फिबियन्स) शामिल हैं, विशेष रूप से विशेष प्रजातियां जैसे बैंगनी मेंढक, जो अपने अस्तित्व के लिए भारी रूप से मॉनसून पर निर्भर होते हैं. आज बैंगनी मेंढक के केवल 135 ही ज्ञात जीवित सदस्य हैं, जिनमें से केवल 3 मादाएं हैं. बदलते मौसम के तेवर कहीं इन बरसात-प्रेमी जीवों के सदियों से विकसित प्रजनन रणनीतियों को डुबोकर तो नहीं ले जाएंगे?

अतुला गुप्ता विज्ञान और पर्यावरण लेखिका हैं, जो विलुप्तप्राय प्रजातियों और जैव विविधता संरक्षण पर काम करती हैं.


Original Publication: NDTV Hindi

Date: 24 September, 2024

Link: बैंगनी मेंढक

]]>
https://atulagupta.in/2024/09/24/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95/feed/ 0
महुआ की छाया में पलती गोंड चित्रकला https://atulagupta.in/2024/03/30/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%a1/ https://atulagupta.in/2024/03/30/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%a1/#respond Sat, 30 Mar 2024 04:49:42 +0000 https://atulagupta.in/?p=17
यह लेख मूल रूप से 30 मार्च 2024 को एनडीटीवी हिंदी में प्रकाशित हुआ था। आप इसे यहां पढ़ सकते हैं।
...........

मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब फागुन के फूल बहार में हों, गोंड जनजाति की महिलाएं अक्सर एक पेड़ के नीचे हजारों की संख्या में बिखरे पड़े मनमोहक फूलों को बीनती हुई मिलेंगी. यह पेड़ इनके लिए रोजगार का साधन भी है, आराधना योग्य भगवान भी और सांस्कृतिक धरोहर भी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इनके जीवन को सजाती और संवारती चली आ रही है. यह विशेष वृक्ष है महुआ, जिसे गोंड आदिवासी “Elixir of Life” या जीवनदायिनी मानते हैं.

गोंड आदिवासी मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और बिहार में रहते हैं. ये भारत के सबसे पुराने भूखंड “गोंडवाना” के मूल निवासी हैं. इस धरा के पेड़, पौधे, जीव-जंतुओं के बारे में जितना इन्हें व्यावहारिक ज्ञान है, उतना शायद ही किताबों में किसी ने लिखा या पढ़ा हो.

गोंड शब्द का अर्थ ही है ‘हरा पहाड़’. ये अपने घरों को पेड़-पौधे, फूल-पत्तियों और जानवरों की आकृतियों से सजाते हैं. इनकी बिंदुओं और रेखाओं वाली चित्रकला अब दुनिया भर में प्रसिद्ध है. वैसे तो इनमें शेर, हिरण, तोते.. सभी चित्रित किए जाते हैं पर जिस चीज को ये सबसे ज्यादा दिखाते हैं, वह है महुआ का पेड़, मानो इसी के इर्दगिर्द सारी दुनिया बसी हो. देखा जाए तो यह इस समुदाय के लिए शाश्वत सत्य भी है.

जन्म से लेकर मृत्यु तक गोंड जनजाति के लोग महुआ के पेड़ का उपयोग करते हैं. उनके हर त्योहार, हर पूजा, हर विशेष दिन में इसका एक महत्वपूर्ण स्थान है. बच्चे के जन्म के समय उसे महुआ का तेल लगाया जाता है, शादी के समय वर-वधु महुआ के तने को पकड़कर उसके चारों ओर रस्म निभाते हैं और मेहमानों का आदर-सत्कार भी महुआ से बनी शराब से किया जाता है. पेट की बीमारियों से लेकर हल्का बुखार होने पर भी महुआ इनके लिए हर रोग का इलाज है. इस वृक्ष को कभी भी काटा नहीं जाता बल्कि गोंड आदिवासी इसे धन-संपत्ति के समान अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ कर जाते हैं.

एक समय था जब भारत में महुआ का पेड़ काफी आम था, खासकर उत्तर और मध्य भारत में. यह इतना प्राचीन पेड़ है कि इसका वर्णन वेदों में किया गया है. चरक संहिता में भी इसके औषधीय गुणों का उल्लेख है. कालिदास ने तो यह भी लिखा है कि मां पार्वती महुआ के बने फूलों का हार पहनती हैं.

महुआ के फूलों की अनूठी बात यह है कि ये रात में खिलते हैं और सुबह तक मुरझा जाते हैं. पेड़ के नीचे बिखरे पड़े फूलों की महक दूर तक जाती है जिससे चमगादड़, जंगली कबूतर, स्लोथ भालू आदि जैसे पशु-पक्षी इनकी ओर खिंचे चले आते हैं. गोंड आदिवासी इन फूलों को इकट्ठा करके उन्हें सुखाते हैं और दुनिया की एकमात्र फूलों से बनने वाली शराब बनाते हैं.

अगर आप गोंड चित्रकला को ध्यान से देखें तो आप पाएंगे कि उसमें कभी हिरण के सींग पेड़ की शाखाओं का आकार ले लेते हैं तो कभी पक्षियों के पंख महुआ की पत्तियां बन जाते हैं. अपनी हर रचना में गोंड यह सरलता से समझाते हैं कि पेड़ों से ही जीव, पेड़ों से ही जीवन है.

मूल लेख प्रकाशति मीडिया: NDTV Hindi
लिंक: महुआ की छाया में पलती गोंड चित्रकला
दिनांक: 30 मार्च 2024
आभार: Nature Conservation Foundation

Featured image courtesy Jean-Pierre Dalbéra cc/Flickr, Ramesh Lalwani cc/Flickr, wikimedia commons

]]>
https://atulagupta.in/2024/03/30/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%a1/feed/ 0