NDTV – Atula Gupta https://atulagupta.in Science | Nature | Conservation Wed, 28 May 2025 07:19:53 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.1 बरसात में ज़मीन खोदकर निकलते हैं सह्याद्रि के अनोखे बैंगनी मेंढक https://atulagupta.in/2024/09/24/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95/ https://atulagupta.in/2024/09/24/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95/#respond Tue, 24 Sep 2024 07:19:35 +0000 https://atulagupta.in/?p=270

चूहे जैसी नुकीली नाक, बैंगनी रंग और बहुत से बैंगनों को अगर आपस में मेंढक के आकार में जोड़ दिया जाए, उस तरह का बुलबुले-सा फूला हुआ आकार – ऐसा एक अलबेला जीव भारत के सह्याद्रि के जंगलों में पाया जाता है. इन्हें नाम दिया गया है पर्पल फ्रॉग या भारतीय बैंगनी मेंढक और यह दुनिया के कुछ सबसे अदभुत माने जाने वाले जीवों में से एक है.

भारतीय बैंगनी मेंढक (Nasikabatrachus sahyadrensis) एक दुर्लभ प्रजाति है, जो अपना अधिकांश जीवन ज़मीन के नीचे बिताते हैं. केवल बरसात के मौसम में यह पृथ्वी के तल से बाहर निकलकर ऊपर ज़मीन पर आते है. इसमें भी मादाएं साल में केवल एक दिन के लिए, और वह भी सिर्फ़ कुछ घंटों के लिए, सतह पर आती हैं, ताकि वे मिलन कर सकें और अपने अंडे दे सकें.

दक्षिणी सह्याद्रि में मानसून की पहली बारिश के तुरंत बाद नर मेंढक भूमिगत रहते हुए ही आवाजें निकालना शुरू कर देते हैं, जैसे पहली बारिश उनके लिए कोई अलार्म घड़ी हो. फिर धीरे-धीरे कुछ नर सतह पर दिखाई देने लगते हैं, मादा के इंतज़ार में. यह इंतज़ार इस बात का भी रहता है कि मौसमी नदियों और धाराओं में अपेक्षाकृत पानी भर जाए.

प्रजनन के स्थान तक की यह यात्रा इन मेंढकों के लिए खतरों से घिरी और फ़िल्मी क्लाइमेक्स से कम नहीं होती. रास्ते में उल्लुओं और चेकर्ड कीलबैक सांपों जैसे शिकारी उन्हें खाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा खतरा सड़कें हैं, जो उनके आवासों को विभाजित करती हैं. कई स्थानों पर ये सड़कें इन मेंढकों के लिए मौत का जाल बन जाती हैं. इसके अलावा, अन्य दबाव जैसे बांध, अनियंत्रित पर्यटन, कचरा आदि तो हैं ही.

हालांकि वैज्ञानिको ने इस प्रजाति की खोज 2003 में की थी, सह्याद्रि के जंगलों में रहने वाली इडुकी इन्हें कई पीढ़ियों से जानते और समझते हैं. माना जाता है कि इन जीवों का प्राचीन वंश लगभग 12 करोड़ वर्षों से स्वतंत्र रूप से विकसित हो रहा है, और इन्होंने नए महाद्वीपों के निर्माण, महान डायनासोर के विनाश, हिमयुग और मनुष्यों के प्रमुख प्रजाति बनने जैसी घटनाओं को जीवित रहते हुए देखा है. वैज्ञानिकों के लिए यह गोंडवानालैंड नामक महाद्वीप के अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण जैविक प्रमाण हैं.

मौसम के पैटर्न में हल्का-सा बदलाव आने पर सबसे पहले प्रभावित होने वाले जीवों के समूहों में उभयचर (एम्फिबियन्स) शामिल हैं, विशेष रूप से विशेष प्रजातियां जैसे बैंगनी मेंढक, जो अपने अस्तित्व के लिए भारी रूप से मॉनसून पर निर्भर होते हैं. आज बैंगनी मेंढक के केवल 135 ही ज्ञात जीवित सदस्य हैं, जिनमें से केवल 3 मादाएं हैं. बदलते मौसम के तेवर कहीं इन बरसात-प्रेमी जीवों के सदियों से विकसित प्रजनन रणनीतियों को डुबोकर तो नहीं ले जाएंगे?

अतुला गुप्ता विज्ञान और पर्यावरण लेखिका हैं, जो विलुप्तप्राय प्रजातियों और जैव विविधता संरक्षण पर काम करती हैं.


Original Publication: NDTV Hindi

Date: 24 September, 2024

Link: बैंगनी मेंढक

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महुआ की छाया में पलती गोंड चित्रकला https://atulagupta.in/2024/03/30/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%a1/ https://atulagupta.in/2024/03/30/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%86-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%a1/#respond Sat, 30 Mar 2024 04:49:42 +0000 https://atulagupta.in/?p=17
यह लेख मूल रूप से 30 मार्च 2024 को एनडीटीवी हिंदी में प्रकाशित हुआ था। आप इसे यहां पढ़ सकते हैं।
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मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब फागुन के फूल बहार में हों, गोंड जनजाति की महिलाएं अक्सर एक पेड़ के नीचे हजारों की संख्या में बिखरे पड़े मनमोहक फूलों को बीनती हुई मिलेंगी. यह पेड़ इनके लिए रोजगार का साधन भी है, आराधना योग्य भगवान भी और सांस्कृतिक धरोहर भी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इनके जीवन को सजाती और संवारती चली आ रही है. यह विशेष वृक्ष है महुआ, जिसे गोंड आदिवासी “Elixir of Life” या जीवनदायिनी मानते हैं.

गोंड आदिवासी मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और बिहार में रहते हैं. ये भारत के सबसे पुराने भूखंड “गोंडवाना” के मूल निवासी हैं. इस धरा के पेड़, पौधे, जीव-जंतुओं के बारे में जितना इन्हें व्यावहारिक ज्ञान है, उतना शायद ही किताबों में किसी ने लिखा या पढ़ा हो.

गोंड शब्द का अर्थ ही है ‘हरा पहाड़’. ये अपने घरों को पेड़-पौधे, फूल-पत्तियों और जानवरों की आकृतियों से सजाते हैं. इनकी बिंदुओं और रेखाओं वाली चित्रकला अब दुनिया भर में प्रसिद्ध है. वैसे तो इनमें शेर, हिरण, तोते.. सभी चित्रित किए जाते हैं पर जिस चीज को ये सबसे ज्यादा दिखाते हैं, वह है महुआ का पेड़, मानो इसी के इर्दगिर्द सारी दुनिया बसी हो. देखा जाए तो यह इस समुदाय के लिए शाश्वत सत्य भी है.

जन्म से लेकर मृत्यु तक गोंड जनजाति के लोग महुआ के पेड़ का उपयोग करते हैं. उनके हर त्योहार, हर पूजा, हर विशेष दिन में इसका एक महत्वपूर्ण स्थान है. बच्चे के जन्म के समय उसे महुआ का तेल लगाया जाता है, शादी के समय वर-वधु महुआ के तने को पकड़कर उसके चारों ओर रस्म निभाते हैं और मेहमानों का आदर-सत्कार भी महुआ से बनी शराब से किया जाता है. पेट की बीमारियों से लेकर हल्का बुखार होने पर भी महुआ इनके लिए हर रोग का इलाज है. इस वृक्ष को कभी भी काटा नहीं जाता बल्कि गोंड आदिवासी इसे धन-संपत्ति के समान अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ कर जाते हैं.

एक समय था जब भारत में महुआ का पेड़ काफी आम था, खासकर उत्तर और मध्य भारत में. यह इतना प्राचीन पेड़ है कि इसका वर्णन वेदों में किया गया है. चरक संहिता में भी इसके औषधीय गुणों का उल्लेख है. कालिदास ने तो यह भी लिखा है कि मां पार्वती महुआ के बने फूलों का हार पहनती हैं.

महुआ के फूलों की अनूठी बात यह है कि ये रात में खिलते हैं और सुबह तक मुरझा जाते हैं. पेड़ के नीचे बिखरे पड़े फूलों की महक दूर तक जाती है जिससे चमगादड़, जंगली कबूतर, स्लोथ भालू आदि जैसे पशु-पक्षी इनकी ओर खिंचे चले आते हैं. गोंड आदिवासी इन फूलों को इकट्ठा करके उन्हें सुखाते हैं और दुनिया की एकमात्र फूलों से बनने वाली शराब बनाते हैं.

अगर आप गोंड चित्रकला को ध्यान से देखें तो आप पाएंगे कि उसमें कभी हिरण के सींग पेड़ की शाखाओं का आकार ले लेते हैं तो कभी पक्षियों के पंख महुआ की पत्तियां बन जाते हैं. अपनी हर रचना में गोंड यह सरलता से समझाते हैं कि पेड़ों से ही जीव, पेड़ों से ही जीवन है.

मूल लेख प्रकाशति मीडिया: NDTV Hindi
लिंक: महुआ की छाया में पलती गोंड चित्रकला
दिनांक: 30 मार्च 2024
आभार: Nature Conservation Foundation

Featured image courtesy Jean-Pierre Dalbéra cc/Flickr, Ramesh Lalwani cc/Flickr, wikimedia commons

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